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November 30, 2021
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दिल्ली सरकार ने ऑक्सीजन मांगी तो केंद्र सरकार ने ‘गर्लफ्रैंड’ को क्यों घसीट लिया?

Bored' Kejriwal during PM-CM COVID conference sparks meme fest on Twitter

ऑक्सीजन की कमी को लेकर लगातार दिल्ली और केंद्र सरकार के बीच खींचतान जारी है. दिल्ली सरकार लगातार केंद्र से ऑक्सीजन मांग रही है. ऐसे में केंद्र सरकार की पैरवी कर रहे SG Tushar Mehta ने कहा कि दोनों सरकारों को नखरे दिखाने वाली गर्लफ्रैंड की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए (दोनों फोटो PTI से हैं)

कोरोना वायरस की दूसरी लहर ने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया है. कई शहरों में हालात बेकाबू हैं. ऑक्सीजन की किल्लत की खबरें कोने-कोने से आ रही हैं. इनमें हमारी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली भी शामिल है. इसी किल्लत को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में कई दिनों से सुनवाई चल रही है. दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के वकील अपना-अपना पक्ष रख रखे हैं. इस दौरान केंद्र सरकार को कानूनी सलाह देने वाले और अलग-अलग अदालतों में उसका पक्ष रखने वाले सॉलिसिटर जनरल ने कुछ बयान दिए हैं, इन्हें लेकर विवाद हो गया है. एक बयान में उन्होंने औरतों को स्टीरियोटाइप करने वाली बातें कहीं. यह बयान क्या है? औरतों को लेकर यह स्टीरियोटाइप हमारे समाज, आर्ट और कल्चर में वो कितना गहरा धंसा हुआ है? सब पर विस्तार से बात करना जरूरी है.

SG Tushar Mehta ने क्या कहा?

ऑक्सीजन की किल्लत के बीच दिल्ली सरकार बार-बार आरोप लगा रही है कि केंद्र सरकार ने उसके कोटे की 480 मीट्रिक टन ऑक्सीजन अभी तक नहीं दी है. दिल्ली हाई कोर्ट ने भी यह माना है कि ऑक्सीजन की आपूर्ति करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है. हालांकि, दिल्ली सरकार से भी पूछा है कि उसने अपने स्तर पर क्या इंतजाम किए हैं. दिल्ली सरकार की तरफ से लगातार लगाए जा रहे आरोपों के बीच केंद्र सरकार की पैरवी कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 22 अप्रैल को कि केंद्र और दिल्ली सरकार को नखरे दिखाने वाली गर्लफ्रैंड की तरह एक-दूसरे पर आरोप लगाने की जगह मिलकर काम करना चाहिए.

सॉलिसिटर जनरल की बयानबाजी यहीं खत्म नहीं हुई. 24 अप्रैल को उन्होंने कहा कि हमें किसी रोंदू बच्चे की तरह व्यवहार करने की जगह जिम्मेदार लोगों की तरह काम करना चाहिए. फिर 26 अप्रैल को कहा कि दिल्ली सरकार को हर वाक्य के अंत में ‘इंसानों की जिंदगी’ जैसी बातें लाकर उसे नाटकीय नहीं बनाना चाहिए. गर्लफ्रैंड वाले बयान की तरह ही तुषार मेहता के इन दोनों बयानों की भी आलोचना हो रही है. होनी भी चाहिए. एक ऐसे वक्त में जब परिवार के परिवार उजड़ रहे हैं. किसी की मां मर रही है, किसी के पिता और भाई और किसी का जवान बेटा या बेटी, तब एक सभ्य समाज में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों से संवेदनशीलता की उम्मीद की जाती है. न कि इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना बयानों की.

अगर हम गौर से देखें तो सरकारों के पास पूरा एक साल था तैयारी करने का. सालभर में सरकार की ही कई कमेटियों ने ऑक्सीजन से लेकर ICU बेड्स का इंतजाम करने को कहा था. लेकिन इनका इंतजाम करने की जगह सरकारें, खासकर कि केंद्र सरकार कोरोना पर जीत की घोषणा करती रही. पश्चिमी देशों के बरक्श भारत को रखकर महामारी की भयावहता की चेतावनी देने वाले एक्सपर्ट्स पर तंज कसती रही. और जब त्रासदी आई तो उसके पास कोई इंतजाम नहीं था. हां, कहने को तमाम सारी बातें थीं.

सरकारें इतनी निष्ठुर हो गईं कि मौत के आंकड़ों को छिपाने लगीं. कानपुर के भैरोघाट पर रोजाना जलने वाले 100 शवों को 4 बताने के लिए अव्वल दर्जे की क्रूरता की जरूरत होती है. फेक न्यूज को कंट्रोल करने के नाम पर व्यवस्था की असलियत उजागर कर रहे लोगों पर रासुका के तहत मुकदमा दर्ज करने की बात कहने के लिए भी इतनी ही क्रूरता की जरूरत होती है . या फिर क्रूरता से भी कहीं अधिक क्रूरता की. और अब तुषार मेहता चाहते हैं कि अप्रत्याशित तरीके से अपनों को खो चुके लोग रोएं भी नहीं. अपनी शिकायत भी दर्ज ना कराएं. अपना गुस्सा भी ना दर्ज कराएं. देश की बड़ी-बड़ी अदालतों में सरकार की पैरवी करने वाले सॉलिसिटर जनरल को शायद ये अंदाजा नहीं है कि सरकारी अव्यवस्था की वजह से दुख, संत्रास और त्रासदी झेल रहे लोग बहुत गुस्से में हैं और दुख के साथ-साथ उन्हें अपना गुस्सा दर्ज कराने का भी उतना ही हक है, जितना तुषार मेहता को सरकार की पैरवी करने का.

गर्लफ्रैंड वाली बात में क्या गलत है?

अब हम तुषार मेहता के गर्लफ्रैंड वाले बयान पर आते हैं. इस मुद्दे पर बात करना बहुत जरूरी है. क्योंकि लड़कियों और महिलाओं को लेकर इस तरह के जो ये पूर्वाग्रह गढ़े गए हैं, वो इतने गहरे हैं कि तुषार मेहता जैसै खूब पढ़े लिखे और देश के ऊंचे पदों पर बैठे पर लोग भी गाहे-बगाहे इनकी पुनरावृत्ति करते रहते हैं. हमारे समाज में इस तरह की धारणा का निर्माण किया गया है कि प्रेमिकाएं, बहनें और पत्नियां नखरे दिखाती हैं. पुरुष चाहें अपना कलेजा ही क्यों ना बिछा दें, लेकिन ये खुश नहीं हो सकतीं. हमेशा शिकायत करेंगी. कभी भी इनका पेट नहीं भरता. लालची होती हैं. पैसे के लिए प्रेम करती हैं. हमेशा भाव खाती हैं. इत्यादि अनादि.

आपने अस्सी और नब्बे के दशक की फिल्में तो देखी ही होंगी. एक हीरो होता है, एक हीरोइन होती है. हीरो ऐसे ही तफरीबाजी कर रहा होता है. तभी उसे हीरोइन दिख जाती है. होरी उत्तेजित हो जाता है. वो उसके पीछे चलने लगता है. इस बीच फिल्म में गाना बजने लगता है. हीरो के साथ उसके तमाम दोस्त आ जाते हैं. जो हीरो जितने ही खलिहर और लफंगा प्रवृत्ति वाले होते हैं. सब मिलकर हीरोइन को परेशान करते हैं. कभी उसका रास्ता रोकते हैं, तो कभी पल्लू पकड़ लेते हैं. हीरोइन अगर कॉपी किताबें लेकर कॉलेज जा रही होती है, तो उसकी कॉपी किताबें हवा में उछाल देते हैं. हीरोइन अगर बटोरने की कोशिश करती है, तो उसकी कलाई पकड़ ली जाती है. इस दौरान हीरोइन के चेहरे पर गुस्सा साफ झलकता है. लेकिन हीरो हाथ नहीं छोड़ता. गाना आगे बढ़ता है और फिर वो हीरोइन जिसने इतना सारा हरासमेंट सहा, वो अचानक से मान जाती है. हीरो से प्यार करने लगती है. प्यार में पड़ने का इससे वाहियात कॉन्सेप्ट तो कुछ हो नहीं सकता.

Protective umbrella' in way of truth, says Tushar Mehta

गज़लों और एल्बमों में भी इसी तरह का स्त्री विरोधी रवैया भर-भरकर ठेला जाता है. नायक गाता है- ‘इसका गम नहीं कि तुमने किया दिल बरबाद, गम ये है कि बहुत देर में बरबाद किया है’. या फिर ‘जा बेवफा जा, हमें प्यार नहीं करना’. अभी के गाने भी ऐसे हैं- ‘मुझे छोड़कर जो तुम जाओगे, बड़ा पछताओ’. ‘दिल तोड़ के हंसती हो मेरा, वफाएं मेरी याद करोगी’. कुल जमा यही कि सारी बेवफाई, धोखा और पुरुष को दुख देने का ठेका महिलाओं ने ले रखा है. वे उन्हें अपने त्रिया चरित्र के जरिए फंसाती हैं और जब काम निकल जाता है, तो छोड़कर चली जाती हैं.

बेचारा सीधा सादा पुरुष कहीं का नहीं रहता. पुरुष तो सदचरित्र और नैतिक होता है. उसकी डिक्शनरी में धोखा, चालबाजी और बेवफाई जैसे शब्द नहीं होते. नखरे दिखाने वाली और चालू लड़कियां हमेशा पुरुषों पर सितम करती हैं. जीवन भर के लिए उनकी आत्मा में घाव छोड़ जाती है. पुरुष उबर नहीं पाते. हर वक्त दर्द में जीते हैं. इन गानों से तो यही संदेश मिलता है. भले ही सच्चाई इसके उलट क्यों ना हो. भले ही सच्चाई ये क्यों ना हो कि हमारे समाज में पुरुषों को कई तरह के विशेषाधिकार मिले हुए हैं, जिसका इस्तेमाल वे अपने फायदे के लिए करते हैं. यहां ध्यान रखना जरूरी है कि सभी पुरुषों की बात नहीं हो रही है, बल्कि एक प्रवृत्ति की बात हो रही है. जो हर घर, हर संगठन और हर ऑफिस में व्याप्त है.

औरतें दूसरे ग्रह से नहीं आई हैं

यह प्रवृत्ति सदियों से चली आ रही है. समाज और संस्कृति की वाहक तमाम इकाइयों में से एक भाषा में गुंथी हुई है. व्यवहार में शामिल है. इसी का परिणाम है कि हमें आए दिन इस तरह के गानों, फिल्मों, साहित्य और यहां तक की चुटकलों से दो चार होना पड़ता है. ऐसा अगर नहीं है तो फिर क्या वजह है कि पति-पत्नी वाले चुटकलों में हमेशा पत्नी का ही मजाक बनाया जाता है. उसे ही मंदबुद्धि, कामचोर और पैसे की भूखी स्त्री के तौर पर चित्रित किया जाता है. जबकि सच्चाई तो यही है कि हमारे घर की महिलाएं सबसे ज्यादा काम करती हैं. घर खर्च के नाम पर उन्हें नाम मात्र के पैसे मिलते हैं. इसमें से भी वे ज्यादातर अपने बच्चों की खुशियों पर खर्च कर देती हैं.

यह इसी प्रवृत्ति का परिणाम है कि सॉलिसिटर जनरल जैसे विद्वान व्यक्ति भी हाई कोर्ट में नखरे वाली गर्लफ्रैंड जैसी घिसी पिटी और रद्दी बातें बोलते हैं. दो लोगों के बीच एक अच्छा रिश्ता या साहित्यिक भाषा में कहें तो आत्मीय संबंध एक दूसरे को समझने और सम्मान देने की भावना पर निर्भर करता है. जो लोग इस बात को नहीं समझ पाते, वो नखरे दिखाने वाली गर्लफ्रैंड या हमेशा नाक पर गुस्सा रखने वाली बीवी जैसी बातें करते हैं और पूरी जिंदगी फ्रस्टेट रहते हैं. लड़कियां, चाहे वो प्रेमिकाएं हों या किसी और रोल में, किसी भी दूसरे पुरुष की तरह ही अच्छी और बुरी दोनों हो सकती हैं. वे दया और करुणा से भी भरी हो सकती हैं और क्रूरता से भी. वे सच्ची भी हो सकती हैं और झूठी भीं. वे डेमोक्रेटिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली राजनीतिक कार्यकर्ता हो सकती हैं और तानाशाह भी. कुल मिलाकर वे कुछ भी हो सकती हैं. औरत कोई दूसरे ग्रह से आया जीव नहीं है कि उसके इर्द गिर्द तरह-तरह के स्टीरियोटाइप गढ़े जाएं. ये बात हम सबको समझने की जरूरत है.

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