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June 20, 2021
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सरकार ने कहा- रेमडेसिविर जीवनरक्षक दवा नहीं, फिर भी देश में इसकी जमाखोरी, राजनीति और कालाबाजारी; जानिए इस इंजेक्शन के बारे में सबकुछ

भारत में दिल्ली-मुंबई से लेकर हर छोटे शहर-कस्बे तक में रेमडेसिविर को लेकर मारामारी है। कहीं राजनीति गरमा रही है तो कहीं लोग ब्लैक में कई गुना ज्यादा पैसा देकर इसे खरीद रहे हैं। केंद्र सरकार ने सोमवार को कहा कि रेमडेसिविर कोरोना मरीजों के लिए जीवनरक्षक दवा नहीं है, यह गैरजरूरी है और इसके इस्तेमाल से कोई फायदा होगा, इसकी गारंटी नहीं है। यह सब देख सोमवार को बॉम्बे हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब तलब कर लिया।

हाईकोर्ट ने केंद्र से सवाल किया कि राज्यों को यह इंजेक्शन किस आधार पर बांटा जा रहा है? महाराष्ट्र में जब देश के 40% कोरोना मरीज हैं तो रेमडेसिविर भी इसी अनुपात में दिया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को भी फटकारा। कोर्ट ने कहा कि जिलों को मनमाने तरीके से रेमडेसिविर का बंटवारा किया जा रहा है।

इससे पहले केंद्र सरकार ने पिछले हफ्ते रेमडेसिविर इंजेक्शन के एक्सपोर्ट पर पाबंदी लगा दी थी। दरअसल, इस इंजेक्शन का इस्तेमाल कोरोना के गंभीर मामलों में हो रहा है। डॉक्टर भी धड़ल्ले से इसे प्रिस्क्राइब कर रहे हैं और खूब ब्लैक मार्केटिंग हो रही है। इस समय देश में 7 कंपनियां इस दवा को बना रही हैं, जिनकी हर महीने 39 लाख शीशियां यानी रोज 1.30 लाख डोज बनाने की क्षमता है। जबकि डिमांड लगातार बढ़ती जा रही है।

आइए, समझते हैं कि रेमडेसिविर और इससे जुड़े संकट को?

रेमडेसिविर क्या है?

  • रेमडेसिविर एक एंटी-वायरल दवा है, जो कथित तौर पर वायरस के बढ़ने को रोकती है। 2009 में अमेरिका के गिलीड साइंसेस ने हेपेटाइटिस सी का इलाज करने के लिए इसे बनाया था। 2014 तक इस पर रिसर्च चला और तब इबोला के इलाज में इसका इस्तेमाल हुआ। रेमडेसिविर का इस्तेमाल उसके बाद कोरोना वायरस फैमिली के मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (मर्स या MERS) और सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (सार्स या SARS) के इलाज में किया गया।
  • यह फॉर्मूला शरीर में वायरस के फलने-फूलने के लिए जरूरी एंजाइम को काबू करता है। अमेरिकी रेगुलेटर US-FDA ने 28 अक्टूबर 2020 को रेमडेसिविर को कोविड-19 के इलाज के लिए मंजूरी दी थी। उस समय डोनाल्ड ट्रम्प इन्फेक्ट हुए तो उन्हें भी रेमडेसिविर दी गई थी।

रेमडेसिविर क्या वाकई इफेक्टिव है?

  • पता नहीं। गिलीड साइंसेस के डेटा के अनुसार रेमडेसिविर कोविड-19 रिकवरी टाइम को पांच दिन तक घटा देता है। अब तक 50 से अधिक देश कोविड-19 के इलाज में इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि, WHO ने ट्रायल्स में इस दावे की पुष्टि नहीं की है।
  • WHO ने कहा कि मरीज के गंभीर लक्षणों या जानलेवा परिस्थितियों पर रेमडेसिविर का कोई असर नहीं दिखा है। साइड इफेक्ट्स जरूर दिखे हैं। इनमें लीवर के एंजाइम्स का बढ़ा स्तर, एलर्जिक रिएक्शन, ब्लडप्रेशर और हार्ट रेट में बदलाव, ऑक्सीजन ब्लड का घटा हुआ स्तर, बुखार, सांस लेने में दिक्कत, होठों, आंखों के आसपास सूजन। ब्लडशुगर भी बढ़ा हुआ दिखा है।
  • भारत सरकार ने भी कहा है कि यह इंजेक्शन लाइफसेविंग दवा में शामिल नहीं है। इसे घर पर देना भी नहीं है। फिर भी पिछले हफ्ते केंद्र ने रेमडेसिविर इंजेक्शन की कीमत 3500 रुपए तय की। यह भी कहा कि अप्रैल के आखिर तक उत्पादन दोगुना हो जाएगा। इसके लिए 6 और कंपनियों को इसके उत्पादन की मंजूरी दे दी गई है।
  • फिलहाल, देश में हर महीने 38.80 लाख इंजेक्शन तैयार किए जा रहे हैं। इस महीने के आखिर तक करीब 80 लाख इंजेक्शन तैयार होंगे। मंत्रालय के मुताबिक, देश में इस वक्त रेमडेसिविर इंजेक्शन के कुल 7 मैन्यूफेक्चरर्स हैं। अब 6 और कंपनियों को इसके उत्पादन की मंजूरी दी गई है। इससे 10 लाख इंजेक्शन हर महीने और बनाए जा सकेंगे। इसके अलावा 30 लाख यूनिट और बनाए जाने की तैयारियां आखिरी दौर में हैं।

रेमडेसिविर का संकट अचानक कैसे खड़ा हो गया?

  • दिसंबर 2020 से फरवरी 2021 के बीच डेली केस की संख्या 30 हजार से भी कम रह गई थी। फरवरी में भारत में कोरोना वायरस के नए केसेज घटकर कुछ हजार रह गए थे। ऐसा लग रहा था कि महामारी खत्म होने के कगार पर है। इसके पहले से ही नए केस घटने लगे थे, तब दिसंबर से ही दवा कंपनियों ने रेमडेसिविर का उत्पादन घटा दिया था। पिछले 6 महीने में भारत ने 100 से अधिक देशों को 11 लाख इंजेक्शन एक्सपोर्ट भी किए हैं।
  • उस समय तैयारियों की कमी कहें या कुछ और, यूरोप-अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों में कोविड-19 की दूसरी या तीसरी लहर आ चुकी थी। ऐसे में भारत को इसके लिए तैयार रहना था, पर ऐसा हुआ नहीं। लोग निश्चिंत हो गए और देश में महामारी की दूसरी लहर और भयावह स्वरूप में सामने आई। पहली लहर में 98 हजार का आंकड़ा पीक का था और दूसरी लहर में एक दिन में 1.80 लाख केस भी सामने आ चुके हैं।
  • इस बीच, जरूरत न होने के बाद भी अस्पतालों में रेमडेसिविर लगाना, बढ़ी हुई कीमतें, जमाखोरी और कालाबाजारी और कई अन्य कारणों से रेमडेसिविर का संकट खड़ा हो गया। जरूरतें बढ़ीं तो एकाएक प्रोडक्शन नहीं बढ़ पाया क्योंकि कंपनियों की कच्चे माल को लेकर इस तरह की तैयारी ही नहीं थी।

क्या सबको रेमडेसिविर इंजेक्शन की जरूरत है?

  • नहीं। केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि रेमडेसिविर सिर्फ उसे ही लगाया जाए, जो अस्पताल में भर्ती हो और ऑक्सीजन सपोर्ट ले रहा हो। जो लोग घर पर आइसोलेशन में हैं, उन्हें इस इंजेक्शन की कतई आवश्यकता नहीं है। नीति आयोग के सदस्य (हेल्थ) डॉ. वीके पॉल ने कहा कि रेमडेसिविर का घर पर मौजूद मरीज पर इस्तेमाल करने का सवाल ही नहीं उठता। केमिस्ट शॉप्स पर इसके लिए लाइन लगाने का कोई मतलब ही नहीं है। समझ नहीं आ रहा कि डॉक्टर भी धड़ल्ले से क्यों इस इंजेक्शन को प्रिस्क्राइब कर रहे हैं।

भारत में रेमडेसिविर कितनी कंपनियां बना रही हैं?

  • भारत में 7 दवा कंपनियां इस समय रेमडेसिविर बना रही हैं। इनमें हिटेरो ड्रग्स, जायडस कैडिला, सन फार्मा और सिप्ला भी शामिल हैं। गिलीड से इन्होंने लाइसेंसिंग एग्रीमेंट किए हुए हैं। इन कंपनियों की कुल उत्पादन क्षमता 39 लाख शीशी हर महीने बनाने की है। जायडस ने मार्च में 100 मिग्रा शीशी की कीमत 2,800 रुपए से घटाकर 899 रुपए कर दी।

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