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जनवरी 15, 2021
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सुरक्षा परिषद में सुधार बना भारत का अहम कूटनीतिक एजेंडा, पीएम मोदी की अगुवाई में भारत अपनी मांग को लेकर हुआ मुखर

भारत काफी लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की स्थायी सदस्यता की दावेदारी करता है। पिछले कुछ महीनों के दौरान राजग सरकार ने इस मुद्दे को जिस तरह से अपनी वैश्विक कूटनीति का हिस्सा बनाया है, वैसा पहले नहीं देखा गया है। पीएम नरेंद्र मोदी की तरफ से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिए गए हर एक भाषण में मौजूदा वैश्विक संगठनों में भारी बदलाव का आह्वान होता है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर, संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधि टीएस त्रिमूर्ति के अलावा दुनिया के तमाम देशों के राजनयिक इस उद्देश्य में नए सिरे से जुटे हुए हैं। दूसरे देशों के साथ होने वाले द्विपक्षीय सहयोग वार्ताओं से लेकर एससीओ, ब्रिक्स जैसे संगठनों में भी भारत के एजेंडे में सबसे ऊपर संयुक्त राष्ट्र में बदलाव का मुद्दा ही है।

अगर पिछले 48 घंटों को ही देखें तो यह बात साफ हो जाती है। ब्रिक्स देशों की शिखर बैठक में पीएम नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र (यूएन), विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) के साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) जैसे वैश्विक संगठनों के मौजूदा ढांचे पर सवाल उठाये और यहां तक कहा कि ये दुनिया में हो रहे बदलावों के मुताबिक अपनी भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं। इनके गवर्नेस को लेकर सवाल उठ रहे हैं और ये संगठन 75 वर्ष पुरानी मानसिकता पर काम रहे हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बदलाव को सबसे जरूरी बताया। 

हाल ही में 10 नवंबर, 2020 को शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर बैठक में भी मोदी ने इन्हीं मुद्दों को सामने रखा था। इन दोनों बैठकों में यूएनएससी के दो स्थाई सदस्य रूस और चीन के राष्ट्राध्यक्ष उपस्थित थे। मोदी के इस भाषण से कुछ ही घंटे पहले संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में भारतीय राजदूत त्रिमूर्ति ने संयुक्त राष्ट्र के ढांचे में बदलाव की राह में रोड़े अटकाने के लिए चीन पर निशाना साधा।

संयु्क्त राष्ट्र में सुधार के लिए सदस्य देशों के बीच गठित अंतर-सरकारी वार्ता (आइजीएन) को औपचारिक दर्जा नहीं देने के मुद्दे पर चीन को निशाने पर लेते हुए कहा, ‘चंद देश नहीं चाहते कि यूएन में कोई सुधार हो। इसलिए वो आईजीएन को हमेशा एक अनौपचारिक निकाय बना कर रखना चाहते हैं। आइजीएन में जो बातचीत होता है, उसका संयुक्त राष्ट्र के तहत आधिकारिक रिकॉर्ड भी नहीं रखा जाता है। इस वजह से यह गंभीर मंच नहीं बन पाया है। यह कुछ देशों की वजह से नहीं हो पाया है, जबकि अधिकांश देश स्थाई व गैर-स्थाई सदस्यता का विस्तार चाहते हैं।’ 

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